Monday, October 15, 2018

ऐसे नवरात्र का त्योहार मनाते थे मुस्लिम शासक

दू त्योहार नवरात्र देशभर में पूरी श्रद्धा से मनाया जा रहा है. डांडिया रास में डूबे युवा इसे लेकर खासे उत्साहित हैं. 10 अक्टूबर से शुरू हुआ नवरात्र 18 अक्टूबर को खत्म होगा.
1398 में जिस वक्त तैमूर ने दिल्ली पर हमला किया था, उस वक्त भी नवरात्र चल रहे थे. उस हमले से नवरात्र पर कितना असर पड़ा ये तो किसी को नहीं पता. लेकिन मुमकिन है कि इसका कुछ असर तो ज़रूर हुआ होगा.
उस वक्त कालकाजी मंदिर और झंडेवालान में बड़े स्तर पर नवरात्र मनाया जाता था.
कहा जाता है कि झंडेवालान मंदिर 12वीं शताब्दी के दौरान पृथ्वीराज चौहान के शासनकाल में बनाया गया था. राजा की बेटी ने इस इलाके में मंदिर का निर्माण करवाया था. तैमूर इसके 200 साल बाद दिल्ली आए थे.
तैमूर के करीब 341 साल बाद 9 मार्च 1739 को नादिर शाह ने चढ़ाई की थी. उस वक्त भी नवरात्र शुरू होने वाले थे. मोहम्मद शाह रंगीला और मुगल बादशाह का रुख़ काफ़ी धर्मनिरपेक्ष था. इन सभी मुस्लिम सम्राटों ने बसंत पंचमी, होली और दिवाली जैसे त्योहार मनाए थे.
नादिर शाह के आक्रमण के 100 साल बाद आए बहादुर शाह ज़फर, दाल और रसा (पूरियों के साथ) खाने के बहुत शौकीन थे. नवरात्र के मौके पर ये पकवान उन्हें चांदनी चौक के सेठ भेजा करते थे.
हिंदू त्योहारों में मुगल राजाओं की सहभागिता के कई ऐतिहासिक सबूत मिलते हैं. शाह आलम ने नवरात्र के मौके पर दिल्ली के कालकाजी मंदिर के पुनर्निर्माण में मदद की थी. उनके उत्तराधिकारी अकबर शाह भी उनके नक्शे कदमों पर चले. अकबर के बेटे ने भी ऐसा ही किया. इसके बाद ब्रिटिश राज शुरू हुआ. टवारे के बाद नवरात्र को और ज़ोर शोर से मनाया जाने लगा. इससे पहले ये त्योहार प्राचीन मंदिरों में मनाया जाता था. लेकिन अब नवरात्र का त्योहार लोग अपने मौहल्लों में मनाने लगे हैं. लोग भंडारे करते हैं और ना सिर्फ भक्तों को बल्कि आस-पास से गुज़रने वाले हर व्यक्ति को खाना खिलाते हैं.
भंडारे में आम खाना नहीं होता. इसे बनाने वालों की भक्ति और भावनाएं इसे खास और अधिक स्वादिष्ट बना देती हैं. हालांकि भंडारे के खाने से लोगों के पेट खराब होने के भी कुछ मामले सामने आते हैं.
नवरात्र के दौरन छतरपुर में लगने वाला मेला खासा लोकप्रिय है. यहां होने वाले भंडारे में लोग लंबी-लंबी कतारे लगाए नज़र आते हैं. ये खाना हर तबके के लोगों के लिए मुफ्त होता है.
छतरपुर के मंदिर में देवी की मूर्ति सोने की है. इसी मंदिर के पास एक और मंदिर है. कहा जाता है कि ये काफ़ी पुराना मंदिर है. कुछ लोगों के मुताबिक ये मंदिर मुस्लिम शासकों के दौर में बना था.
दिल्ली के कालकाजी मंदिर को भी ऐतिहासिक बताया जाता है, हालांकि उसके सबसे पूराने हिस्से का निर्माण 1764 और 1771 में हुआ था.
नवरात्र महोत्सव के अलावा वहां हर मंगलवार देवी काली मां के सम्मान में एक मेला भी लगता है.
झंडेवालान में भी बहुत से मंदिर हैं. यहां भी देवी का एक बहुत पुराना मंदिर है. नवरात्र के मौके पर यहां लोग भारी भीड़ में आते हैं. एक दोपहर यहां 60 हज़ार लोग आए और 12 हज़ार ने भंडारा खाया.
दिल्ली के कनॉट प्लेस के नज़दीक मौजूद हनुमान मंदिर में भी मंगलवार और शनिवार को भक्तों का तांता लगता है. नवरात्र के दिनों में ब्राह्मणों और हलवाइयों की भी खूब कमाई होती है. लेकिन महंगाई और बढ़ते दामों के इस दौर में इनकी आमदनी पर भी असर पड़ा है.
असम में एक फ़ेक एनकाउंटर मामले में सेना के तीन अधिकारी और चार सैनिकों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई है.
सज़ा पाने वालों में सेना के पूर्व मेजर जनरल, दो कर्नल और सात सैनिक शामिल हैं.
आर्मी कोर्ट यह फ़ैसला 24 साल पुराने मामले में सुनाया है. साल 1994 में ऑल असम स्टूडेंट यूनियन से जुड़े पांच युवकों को फर्जी एनकाउंटर में मार दिया गया था.
इस साल एक चाय बागान के अधिकारी की हत्या के संदेह में कई को गिरफ़्तार किया गया था. जिसके कुछ दिन बाद पांच युवाओं को चरमपंथी क़रार देते हुए सैनिकों ने पांच युवाओं को फ़ेक एनकाउंटर में मार गिराया था.
गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर को एम्स से छुट्टी दे दी गई है. वो रविवार को एयर एंबुलेंस से गोवा लौट गए.
पर्रिकर का दिल्ली एम्स में पैन्क्रियाज़ से जुड़ी बीमारी का इलाज चल रहा था. ख़बरों के मुताबिक रविवार सुबह उनकी तबीयत बिगड़ी थी, जिसके बाद उन्हें आईसीयू में भर्ती कराया गया था.
इसके बाद उन्हें एयर एंबुलेंस से गोवा ले जाया गया है. कुछ ख़बरों का यह भी दावा है कि उनकी स्थिति अब बेहतर है.
फ़िलहाल पर्रिकर अपने निजी आवास पर इलाज करा रह हैं.द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने कहा है कि वायु प्रदूषण रोकने के लिए सोमवार से आपात कार्ययोजना लागू की जाएगी.
इसके तहत दिल्ली में हवा की गुणवत्ता बेहद ख़राब होने की स्थिति में विभिन्न क़दम उठाए जाएंगे.
योजना के तहत अगर वायु की गुणवत्ता 'मीडियम स्तर से ख़राब' होती है तो कचरा फेंकने वाली जगहों पर कचरा जलाना रोक दिया जाएगा और ईंट भट्ठी और उद्योगों के प्रदूषण पर लगाम लगाया जाएगा.
अगर हवा की गुणवत्ता 'बहुत ख़राब' होती है तो डीजल से चलने वाली जेनरेटर मशीनों का इस्तेमाल रोक दिया जाएगा.
वहीं अगर हवा की गुणवत्ता 'बहुत ज़्यादा ख़राब' होती है तो दिल्ली में ट्रकों का प्रवेश रोक दिया जाएगा. साथ ही निर्माण गतिविधियों रोक दी जाएगी और स्कूल तक बंद करने के अतिरिक्त फ़ैसले लिए जा सकते हैं.
तेल की कीमतों में लगातार हो रही बढोतरी के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोमवार को तेल कंपनियों के मुखियाओं से मिलेंगे.
कुछ दिन पहले सरकार ने प्रति लीटर 2.50 रुपए की राहत दी थी. कई राज्यों ने भी वैट कम करते हुए अतिरिक्त 2.50 रुपए कम किए थे.
बावजूद इसके तेल की क़ीमत लगातार बढ़ रही है. ऐसे में सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देशी और विदेशी तेल कंपनियों के चीफ़ एक्जीक्यूटिव से भी मिलेंगे.
सऊदी अरब के शाह सलमान और तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तेयेप अर्दोआन फोन पर चर्चित पत्रकार जमाल ख़ाशोज्जी की ग़ुमशुदगी पर चर्चा की है. दोनों नेताओं ने इस मामले की संयुक्त जांच पर भी बात की.
ख़ाशोज्जी दो अक्तूबर को इस्तांबुल में सऊदी अरब के दूतावास जाने के बाद से लापता हैं. अर्दोआन सऊदी अरब से ख़ाशोज्जी के बारे में अधिक जानकारी देने की मांग कर रहे हैं.
सऊदी अरब ने ख़ाशोज्जी की दूतावास के भीतर ही हत्या किए जाने के दावों का खंडन किया है. सऊदी के शाह ने तुर्की और सऊदी अरब के मज़बूत संबंधों का हवाला देते हुए कहा है कि कोई भी इन संबंधों में दरार नहीं पैदा कर सकता है.
विश्लेषकों का कहना है कि सऊदी शाह की ये टिप्पणी इस संटक के कूटनीतिक हल की कोशिशों का संकेत हैं. इसी बीच जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन ने जमाल ख़ाशोज्जी मामले की विश्वसनीय जांच किए जाने की मांग की है.

Monday, October 8, 2018

भारत का वो पहला अख़बार जिसने अंग्रेज़ हुकूमत को हिला दिया था

भारत के पहले समाचार पत्र की स्थापना साल 1780 में हुई थी. उस समाचार पत्र ने उस वक़्त अंग्रेज़ साम्राज्य को आईना दिखाने के काम किया था. उसने हुकूमत को प्रेस की ताक़त का एहसास करवाया था.
बात हो रही है 'बंगाल गज़ट' की जिसे भारत से प्रकाशित होने वाले पहले अख़बार का दर्ज़ा प्राप्त है. बंगाल गज़ट की शुरुआत जेम्स ऑगस्टस हिक्की ने की थी.
उस वक़्त इस अखबार ने अपनी ख़बरों से अंग्रेज़ हुकूमत के शीर्ष पर मौजूद कई ताक़तवर लोगों को हिला कर रख दिया था.
अपनी ख़बरों के दम पर बंगाल गज़ट ने कई लोगों के भ्रष्टाचार, घूसकांड और मानवाधिकार उल्लंघनों को उजागर किया था.
अपने इन्हीं दावों में से एक दावे में बंगाल गज़ट ने उस वक़्त भारत के गवर्नर जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स पर आरोप लगाया था कि उन्होंने भारतीय सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस को घूस दी है.
इस अख़बार में भारत के ग़रीबों का ज़िक्र किया जाता था. उन सैनिकों की ख़बरें प्रकाशित की जाती थीं जो ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की तरफ से युद्ध में लड़ते हुए मारे गए.
ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत के लगभग समूचे हिस्से पर अपनी सत्ता फैला ली थी, इसके साथ ही कंपनी के सैनिक भी सभी जगह तैनात रहते थे.
हालांकि साल 1857 की क्रांति ने अंग्रेज़ों को चौकन्ना ज़रूर कर दिया था. ऐसा भी कहा जाता है कि 1857 की क्रांति के लिए बंगाल गज़ट ने ही भारतीय सैनिकों को विद्रोह के लिए तैयार किया था और हेस्टिंग्स के ख़िलाफ़ जाने के लिए उनके भीतर ज्वाला भरी थी.
बंगाल गज़ट अपनी प्रभावी पत्रकारिता के ज़रिए अंग्रेज सरकार की आंखों में चुभने लगा था, ख़ासतौर पर वॉरेन हेस्टिंग्स इससे सबसे अधिक प्रभावित थे.सका नतीज़ा यह हुआ कि ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंगाल गज़ट के मुकाबले में एक दूसरे प्रतिस्पर्धी अख़बार पर पैसा लगाना शुरू कर दिया. हालांकि वह बंगाल गज़ट की आवाज़ पर रोक नहीं लगा सके.
आखिरकार, जब अखबार में एक अज्ञात लेखक ने यह लिख दिया कि 'सरकार हमारे भले के बारे में नहीं सोच सकती तो हम भी सरकार के लिए काम करने के लिए बाध्य नहीं हैं', तब ईस्ट इंडिया कंपनी ने इस अख़बार को बंद करने का फ़ैसला सुना दिया.
दूसरी तरफ हेस्टिंग्स ने हिक्की पर परिवाद का मुकदमा दायर कर दिया. हिक्की को दोषी पाया गया और उन्हें जेल जाना पड़ा.
लेकन जेल जाने के बाद भी हिक्की के हौसले पस्त नहीं हुए. वो जेल के भीतर से ही 9 महीनों तक अख़बार निकालते रहे.
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट को एक विशेष आदेश के ज़रिए उनकी प्रिंटिंग प्रेस को ही सील करवाना पड़ा. इस तरह भारत का पहला समाचार पत्र बंद हो गया.
लेकिन बंद होने से पहले बंगाल गज़ट हेस्टिंग्स और सुप्रीम कोर्ट के बीच मिलीभगत के इतने राजदार पर्दे खोल चुका था कि इंग्लैंड को इस मामले में दखल देनी ही पड़ी और संसद सदस्यों ने इस मामले में जांच बैठाई.
जांच पूरी होने के बाद हेस्टिंग्स और सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस, दोनों को ही महाभियोग का सामना करना पड़ा.
वैसे अख़बारों की दुनिया के लिए कहानी आज भी बहुत ज़्यादा नहीं बदली है. आज भी प्रेस का गला घोंटने की तमाम कोशिशें की जाती हैं.
सत्ता में बैठे तमाम बड़े लोगों के पास इतनी ताक़त होती है वो आम लोगों को अपनी बात मानने पर मजबूर कर ही देते हैं, ये आम लोग अख़बारों में क्या पढ़ना चाहिए और कैसे पढ़ना चाहिए सबकुछ इन्हीं ता़कतवर लोगों के अनुसार पढ़ रहे होते हैं.
राजनीति में तानाशाहों का होना कोई नई बात नहीं है. लेकिन सवाल उठता है कि आखिर मौजूदा वक़्त में यह इतना ख़तरनाक क्यों हो गया है?
दरअसल अब समाचार प्राप्त करने के इतने अधिक माध्यम हैं कि ग़लत और सही समाचार में फ़र्क पहचान पाना बहुत मुश्किल हो गया है.
फ़ेसबुक, व्हाट्सऐप, ट्विटर और भी ना जाने कितने माध्यमों के ज़रिए कई तरह के समाचार हरवक़्त हमारी नज़रों के सामने तैरते रहते हैं.
इसका नतीजा यह हुआ है कि दुनियाभर में लोग अपनी-अपनी विचारधारा के अनुसार बंटने लगे हैं.
सोशल मीडिया पर फ़ैली ख़बरें लोगों में हिंसा भड़काने का काम कर रही हैं. जैसे भारत में ही व्हाट्सऐप के ज़रिए बच्चा चोरी की कुछ ख़बरें फैल गईं और उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप भीड़ ने कुछ लोगों को मार भी दिया.
ऐसे माहौल में गूगल, फ़ेसबुक और ट्विटर जैसी कंपनियों की ज़िम्मेदारी बनती है कि वो ख़बरों के लिए कुछ मानक तय करें.
हमें याद रखना चाहिए कि हेस्टिंग्स जैसे लोग तो आते हैं और चले जाते हैं, लेकिन ये लोग अपनी परछाईं को हमेशा के लिए अंकित ज़रूर कर देते हैं.
हेस्टिंग्स जैसे लोग भारत में अपनी राजनीति को इस तरह से संगठित करते हैं कि करोड़ों की आबादी वाला भारत कुछ सैकड़ों लोगों के हाथों की कठपुतली बन जाता है.
आज से कई सौ साल पहले हेस्टिंग्स और हिक्की के बीच जो लड़ाई हुई थी वह मौजूदा वक़्त से ज़्यादा अलग नहीं है, उस में फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि अब इस लड़ाई को लड़ने वाले हथियार बदल गए हैं.

Monday, October 1, 2018

झारखंड : यहां 10 साल से क्यों लागू है धारा 144

तारीख थी 9 मई, 2008. जमशेदपुर के कदमा स्थित गणेश पूजा मैदान में पहली बार निषेधाज्ञा लगाई गई.
दस साल से ज़्यादा वक़्त बीत जाने के बाद भी यहां से धारा 144 यानी निषेधाज्ञा नहीं हटाई गई है.
इस स्थिति का मतलब ये है कि यहां पांच या उससे अधिक लोग एक साथ जमा नहीं हो सकते हैं. ऐसा होने पर उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता है.
निषेधाज्ञा की अवधि अब तक 37 बार बढ़ाई जा चुकी है. झारखंड में ये पहला मामला है, जब किसी इलाके में इतने वक्त तक निषेधाज्ञा लगू है.
आमतौर पर निषेधाज्ञा 1-2 दिनों में हटा ली जाती है. कभी-कभी तो ये सिर्फ 1-2 घंटे के लिए लगाई जाती है.
दरअसल, गणेश पूजा मैदान के एक हिस्से में झारखंड मुक्ति मोर्चा के दिवंगत सासंद सुनील महतो की प्रतिमा स्थापित करने को लेकर दो गुटों मे विवाद हुआ था.
एक पक्ष यहां सुनील महतो की प्रतिमा स्थापित करना चाहता था. वहीं दूसरे पक्ष का कहना था कि ये गणेश पूजा मैदान है. यहां किसी की प्रतिमा स्थापित नही होनी चाहिए.
इस बात को लेकर हुई हिंसक झड़प के बाद तत्कालीन एसडीओ राकेश कुमार की पहल पर यहां पहली बार निषेधाज्ञा लगाई गई.
स्थानीय पत्रकार सरताज आलम ने बताया, "इसके बाद हाईकोर्ट में इसे लेकर दो रिट पिटीशन दायर कराए गए".
इस पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने 14 मई 2008 को उस मैदान में यथास्थिति बनाए रखने का अंतरिम आदेश दिया. तबसे यहां धारा-144 (यथास्थिति) लागू है.
जमशेदपुर की पूर्व सासंद सुमन महतो बताती हैं कि उनके दिवंगत पति सुनील महतो के स्मारक स्थापित करने को लेकर हुए इस विवाद के पीछे वैसे लोगों का हाथ है, जो नहीं चाहते कि किसी आदिवासी नेता को सम्मान मिले.
सुमन महतो ने बीबीसी से कहा, "सासंद रहते हुए मेरे पति स्वर्गीय सुनील महतो यहां रहा करते थे. गणेश पूजा मैदान के बगल में ही उऩका दफ्तर था. उनकी हत्या के बाद उनके शव को लोगों के दर्शनार्थ इसी मैदान में रखा गया."
"तब यह सहमति बनी कि यहां उनकी प्रतिमा स्थापित की जाए. इसके बाद गणेश पूजा मैदान के एक हिस्से में स्मारक निर्माण का काम शुरू हो गया."
"तब किसी ने विरोध नही किया. एक साल बाद जब स्मारक की छत के लिए ढलाई की जाने लगी, तब विवाद पैदा कर स्मारक निर्माण रुकवा दिया गया. यहां निषेधाज्ञा लगा दी गई, ताकि हम उनकी प्रतिमा नहीं लगा सकें. तबसे यह मामला कोर्ट में है."
सुनील महतो जमशेदपुर के सासंद थे. साल 2007 में 4 मार्च को होली के दिन नक्सलियों ने उनकी गोली मारकर हत्या कर दी थी.
उस वक्त महतो घाटशिला इलाके के बाघड़िया के एक फुटबॉल मैच में बतौर मुख्य अतिथि भाग ले रहे थे.
नक्सलियों ने जब हमला किया तब सैंकड़ों लोग वहां मौजूद थे. इस हादसे में उनकी मौत घटनास्थल पर ही हो गई थी.
उसके बाद हुए उपचुनाव में दिवंगत सुनील महतो की पत्नी सुमन महतो ने चुनाव लड़ा और जमशेदपुर की सांसद बनीं.
कदमा मैदान में स्मारक निर्माण का विरोध करन वाली संस्था श्री बाल गणेश विलास के अध्यक्ष बी बापू ने बीबीसी से कहा कि अब इस विवाद का समाधान निकलना चाहिए.
उन्होंने कहा कि गणेश पूजा मैदान की पहचान भगवान गणेश से है. यहां साल 1960 से गणेश पूजा होती आ रही है. लिहाजा, यहां भगवान गणेश का भव्य मंदिर बनाया जाना चाहिए.
बी बापू का कहना है, "विवाद के हल के उद्देश्य से हमलोगों ने कोर्ट की शरण ली थी, लेकिन अब हमें कोर्ट से कोई नोटिस नहीं मिलता."
"हमारी संस्था के तत्कालीन अध्यक्ष केजे राव के नेतृत्व मे स्थानीय लोगों ने कदमा मैदान में स्मारक बनाए जाने का विरोध किया था."
"वे भारतीय जनता पार्टी के सक्रिय सदस्य होने के साथ ही कई हिंदू संस्थाओं से जुड़े हुए थे. अब हमारी संस्था को 100 साल पूरे हो रहे हैं."
"हम नही चाहते कि स्मारक के नाम पर लोग इस मैदान पर कब्ज़े की कोशिश करें."
स्थानीय व्यावसायी अज़ीज़ अख़्तर मानते हैं कि ये बेकार का विवाद है.
उन्होंने कहा कि दोनों पक्षों को आपसी समन्वय के साथ कोर्ट में जाकर इसका हल निकलवाना चाहिए.
बक़ौल अज़ीज़ अख़्तर, यहाँ धारा 144 लगे होने के कारण सार्वजनिक आयोजनों में परेशानी होती है. वो कहते हैं "अगर निषेधाज्ञा हटा ली जाए, तो पूरे मैदान का उपयोग कार्यक्रमों के लिए किया जा सकेगा."
"शहर के बीचों बीच इतनी बड़ी जगह होने के बाद भी इसका उपयोग नहीं हो पा रहा है. इस मामले में टाटा स्टील को पहल करनी चाहिए."
पूर्वी सिंहभूम के उपायुक्त अमित कुमार ने बताया कि कदमा मैदान में कोर्ट के आदेश पर निषेधाज्ञा की अवधि बढ़ाई जाती है.
लिहाजा, जब तक ये विवाद न्यायिक प्रक्रिया में है, हम सिर्फ उन आदेशों का पालन ही कर सकते हैं. अदालत ने अभी अंतिम आदेश नहीं दिया है.
जब वह आदेश मिलेगा, प्रशासन उसके मुताबिक काम करेगा.
स्पष्ट है कि कदमा मैदान में जारी निषेधाज्ञा अभी आगे भी जारी रहेगी.