में सांप्रदायिक सौहार्द से जुड़ी एक ख़बर छपी है. ख़बर के मुताबिक साल
2013 में हुए मुजफ़्फरनगर दंगों में रामवीर कश्यप नाम एक शख़्स ने 120 साल पुरानी मस्जिद तोड़ने से बचाई थी.
ये मुज़फ़्फ़रनगर के ननहेड़ा गांव में एकमात्र मस्जिद बची है. 59 साल के रामवीर ने हमले के दौरान इस मस्जिद को बचाने के लिए लोगों को इकट्ठा कर लिया था.
अब रामवीर इस मस्जिद की देखरेख करते हैं. इसमें सफ़ाई करने, शाम को मोमबत्ती जलाने और ज़रूरत पड़ने पर सफ़ेदी करने की ज़िम्मेदारी भी वही संभालते हैं.
कुछ मामलों को सरकारें अदालत के विवेक पर छोड़ देती हैं और उसमें कोई पक्ष नहीं लेतीं. समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर रखने के मामले में भी सरकार ने ऐसा ही किया था.
इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के एक कार्यकर्म में यही सवाल उठाया है.
उन्होंने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि कुछ फ़ैसलों को सरकारें आखिर कोर्ट के विवेक पर क्यों छोड़ देती हैं? नेता आखिर जजों के हाथ में शक्ति क्यों सौंप देते हैं?
उन्होंने कहा कि 'इनमें कई बार बेहद संवेदनशील मसले भी होते हैं. हम देख रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट में आए दिन ऐसा होता है.'
जस्टिस चंद्रचूड़ ने जजों के लिए सलाह भी दी कि उन्हें याद रखना चाहिए कि 'चापलूसी एक दिन धोखे का कारण भी बन सकती है.' ने साइकिल चलाने वालों की मुश्किलों और चुनौतियों को लेकर एक रिपोर्ट दी है. इसमें बताया गया है कि साइकिल चलाने वाले सड़क पर किन-किन मुश्किलों का सामना करते हैं.
जैसे उनके लिए सड़क पर अगल ट्रैक नहीं बने होते. उन्हें बड़ी गाड़ियों से निकलने वाले प्रदूषण के बीच साइकिल चलानी पड़ती है क्योंकि साइलिक धीरे चलती है और मुंह भी ढका नहीं होता, इसलिए उन्हें प्रदूषण में सबसे ज़्यादा रहना पड़ता है.
साथ ही उन्हें साइकिल खड़ी करने के लिए भी सुरक्षित जगह उपलब्ध नहीं होती. भारत में बाइक की तरह हेल्मेट और सुरक्षा के अन्य साधनों के इस्तेमाल को लेकर भी गंभीर सोच नहीं है, इसलिए उनकी जान को ख़तरा भी बना रहता है.
इसमें बताया गया है कि कामकाजी जनसंख्या के 11 प्रतिशत लोग साइकिल चलाते हैं और हर हफ्ते दो साइकिल सवारों की सड़क दुर्घटना में मौत हो जाती है. में दी गई ख़बर के मुताबिक अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने कहा है कि कुछ ऐसे देश हैं जिन्हें विकासशील अर्थव्यवस्था माना जाता है और इस कारण उन्हें हम सब्सिडी देते हैं. यह पूरी तरह से मूर्खतापूर्ण है. हम इसे रोकने जा रहा रहे हैं.
ट्रंप ने कहा कि भारत-चीन या इस तरह के अन्य देश क्या विकासशील हैं, जो खुद को इस श्रेणी में रखकर हमसे रियायतें लेते हैं.
उन्होंने कहा कि अमरीका भी विकासशील राष्ट्र है. वह भी अमरीका को इस श्रेणी में रखना चाहते हैं क्योंकि वो भी विकास कर रहा है बल्कि अन्य किसी की तुलना में तेज़ी से विकास कर रहा है.
आगामी पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा की यह बैठक उसके चुनावी एजेंडे को तय करने पर विचार करेगी.
बीबीसी संवाददाता नितिन श्रीवास्तव इस बैठक पर अपनी नज़र बनाए हुए हैं. उनके मुताबिक भाजपा को यह उम्मीद नहीं थी कि 2019 के चुनाव के क़रीब आने तक इस तरह के मुद्दे सुर्खियों में रहेंगे जैसे कि आज हैं. मिसाल के तौर पर दलितों का मामला, संवैधानिक मसले, अगड़ी जातियों के बीच बढ़ते विरोध के स्वर इत्यादि.
बीबीसी हिंदी रेडियो के कार्यक्रम इंडिया बोल में हिस्सा लेने आईं वरिष्ठ पत्रकार राधिका रामाशेषन ने इस बैठक की महत्ता पर विस्तार से अपनी बात रखी, पढ़िए उनका नज़रियाः
जिन मुद्दों पर बाहर चर्चा हो रही है चाहे वह महंगाई हो, पेट्रोल के दाम बढ़ने की बात हो, रुपये का गिरना हो या दलितों के साथ अत्याचार की ख़बरें हों. इन सभी की जानकारी भाजपा कार्यकर्ता से लेकर ऊपर बैठे नेताओं तक को है.
जिस तरह से पेट्रोल के दाम बढ़ रहे हैं, उससे कार्यकर्ताओं के बीच भी एक तरह का आक्रोश है.
यही वजह है कि उत्तर प्रदेश के देवरिया से सांसद कलराज मिश्र जैसे अहम व्यक्ति को यह ट्वीट करना पड़ता है कि हमें सवर्णों और अगड़ों का भी ध्यान रखना चाहिए और एकतरफ़ा नीति नहीं बनानी चाहिए.
इसलिए जितने भी मुद्दे देश में चल रहे होते हैं उनकी चर्चा पार्टी में अंदर ही अंदर ज़रूर होती है. लेकिन राष्ट्रीय कार्यकारिणी जैसे मंचों पर अब इन मुद्दों पर खुलकर चर्चा बंद हो गई है.
एक ज़माने में देश में चल रहे मुद्दों पर खुलकर चर्चाएं होती थीं, तीखी आलोचनाएं होती थीं और ये आलोचनाएं पत्रकारों तक भी पहुंच जाती थीं. लेकिन आज के समय में तो इन बैठकों में बस अच्छी-अच्छी सुनाई देने वाली बातें ही हो रही हैं.
अमित शाह का सिर्फ़ एक ही लक्ष्य बना हुआ और वो है कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखना जिससे भाजपा पिछले चुनाव में जितनी सीटें जीतकर सत्ता में आई थी, इस बार उससे ज़्यादा सीटें जीते.
डॉलर के मुकाबले रुपया लगातार गिर रहा है, इसका सबसे अधिक असर छात्रों पर पड़ेगा.
2014 से पहले नरेंद्र मोदी अपने हर भाषण में रुपये के गिरने का ज़िक्र बार-बार करते थे और इसका असर भी पड़ा.
यही वजह थी कि उस समय देश के युवाओं, छात्रों और नौकरी की तलाश कर रहे बेरो़ज़गारों ने मोदी के नाम पर भाजपा को वोट किया था.
इन सभी को कहीं न कहीं एक विश्वास हो रहा था कि अच्छे दिन शायद आने वाले हैं. और अब हाल यह है कि अब ये अच्छे दिन वाला नारा ही भाजपा को उल्टा चुभ रहा है.
उत्तर प्रदेश और दूसरी जगहों पर इस नारे का मज़ाक बनाया जा रहा है.
इसके साथ ही मोदी सरकार से किसान बहुत अधिक नाराज़ हैं. किसानों को ऐसा लग रहा है कि उन्हें उनकी फ़सल का न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं मिल रहा.
हालांकि इस मामले में हम सरकार को दोषी नहीं ठहरा सकते. सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) बढ़ाया है. बड़ा सवाल यह है कि किसानों तक यह मूल्य पहुंचता है या नहीं.
अगर आगामी प्रदेश चुनावों का ज़िक्र करें तो भाजपा के रणनीतिकार यही कहते हैं कि हमारे पास मोदी कार्ड है और अंत में वही काम करेगा.
कर्नाटक जैसे राज्य तक में मोदी के चेहरे ने काम किया, हालांकि पूरी तरह वहां पार्टी सफल नहीं हुई और उसे बहुमत नहीं मिल पाया.
मैं कर्नाटक चुनाव कवर कर रही थी तब भी लगा था कि मोदी की रैलियों ने चुनाव का माहौल भाजपा की तरफ़ करने का काम किया था.
ऐसे में इतना तो साफ़ है कि आने वाले विधानसभा चुनावों में भी भाजपा मोदी कार्ड ही खेलेगी.
तब हमें यह देखना होगा कि राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में जहां भाजपा 15 साल से सरकार में है वहां मोदी सत्ता विरोधी लहर को रोक पाते हैं या नहीं.
जैसे गुजरात विधानसभा चुनाव में मोदी भाजपा को जिताने में तो कामयाब रहे, लेकिन उतनी बड़ी जीत नहीं दिलवा सके जितनी उनसे अपेक्षा थी.
इसी तरह सुनने को मिल रहा है कि राजस्थान में सत्ता विरोधी लहर बहुत अधिक है, तो क्या मोदी फ़ैक्टर उसे दूर कर पाएगा. वो भी तब जब राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे अपने-आप में काफी बड़ी नेता हैं.
ये मुज़फ़्फ़रनगर के ननहेड़ा गांव में एकमात्र मस्जिद बची है. 59 साल के रामवीर ने हमले के दौरान इस मस्जिद को बचाने के लिए लोगों को इकट्ठा कर लिया था.
अब रामवीर इस मस्जिद की देखरेख करते हैं. इसमें सफ़ाई करने, शाम को मोमबत्ती जलाने और ज़रूरत पड़ने पर सफ़ेदी करने की ज़िम्मेदारी भी वही संभालते हैं.
कुछ मामलों को सरकारें अदालत के विवेक पर छोड़ देती हैं और उसमें कोई पक्ष नहीं लेतीं. समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर रखने के मामले में भी सरकार ने ऐसा ही किया था.
इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के एक कार्यकर्म में यही सवाल उठाया है.
उन्होंने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि कुछ फ़ैसलों को सरकारें आखिर कोर्ट के विवेक पर क्यों छोड़ देती हैं? नेता आखिर जजों के हाथ में शक्ति क्यों सौंप देते हैं?
उन्होंने कहा कि 'इनमें कई बार बेहद संवेदनशील मसले भी होते हैं. हम देख रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट में आए दिन ऐसा होता है.'
जस्टिस चंद्रचूड़ ने जजों के लिए सलाह भी दी कि उन्हें याद रखना चाहिए कि 'चापलूसी एक दिन धोखे का कारण भी बन सकती है.' ने साइकिल चलाने वालों की मुश्किलों और चुनौतियों को लेकर एक रिपोर्ट दी है. इसमें बताया गया है कि साइकिल चलाने वाले सड़क पर किन-किन मुश्किलों का सामना करते हैं.
जैसे उनके लिए सड़क पर अगल ट्रैक नहीं बने होते. उन्हें बड़ी गाड़ियों से निकलने वाले प्रदूषण के बीच साइकिल चलानी पड़ती है क्योंकि साइलिक धीरे चलती है और मुंह भी ढका नहीं होता, इसलिए उन्हें प्रदूषण में सबसे ज़्यादा रहना पड़ता है.
साथ ही उन्हें साइकिल खड़ी करने के लिए भी सुरक्षित जगह उपलब्ध नहीं होती. भारत में बाइक की तरह हेल्मेट और सुरक्षा के अन्य साधनों के इस्तेमाल को लेकर भी गंभीर सोच नहीं है, इसलिए उनकी जान को ख़तरा भी बना रहता है.
इसमें बताया गया है कि कामकाजी जनसंख्या के 11 प्रतिशत लोग साइकिल चलाते हैं और हर हफ्ते दो साइकिल सवारों की सड़क दुर्घटना में मौत हो जाती है. में दी गई ख़बर के मुताबिक अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने कहा है कि कुछ ऐसे देश हैं जिन्हें विकासशील अर्थव्यवस्था माना जाता है और इस कारण उन्हें हम सब्सिडी देते हैं. यह पूरी तरह से मूर्खतापूर्ण है. हम इसे रोकने जा रहा रहे हैं.
ट्रंप ने कहा कि भारत-चीन या इस तरह के अन्य देश क्या विकासशील हैं, जो खुद को इस श्रेणी में रखकर हमसे रियायतें लेते हैं.
उन्होंने कहा कि अमरीका भी विकासशील राष्ट्र है. वह भी अमरीका को इस श्रेणी में रखना चाहते हैं क्योंकि वो भी विकास कर रहा है बल्कि अन्य किसी की तुलना में तेज़ी से विकास कर रहा है.
आगामी पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा की यह बैठक उसके चुनावी एजेंडे को तय करने पर विचार करेगी.
बीबीसी संवाददाता नितिन श्रीवास्तव इस बैठक पर अपनी नज़र बनाए हुए हैं. उनके मुताबिक भाजपा को यह उम्मीद नहीं थी कि 2019 के चुनाव के क़रीब आने तक इस तरह के मुद्दे सुर्खियों में रहेंगे जैसे कि आज हैं. मिसाल के तौर पर दलितों का मामला, संवैधानिक मसले, अगड़ी जातियों के बीच बढ़ते विरोध के स्वर इत्यादि.
बीबीसी हिंदी रेडियो के कार्यक्रम इंडिया बोल में हिस्सा लेने आईं वरिष्ठ पत्रकार राधिका रामाशेषन ने इस बैठक की महत्ता पर विस्तार से अपनी बात रखी, पढ़िए उनका नज़रियाः
जिन मुद्दों पर बाहर चर्चा हो रही है चाहे वह महंगाई हो, पेट्रोल के दाम बढ़ने की बात हो, रुपये का गिरना हो या दलितों के साथ अत्याचार की ख़बरें हों. इन सभी की जानकारी भाजपा कार्यकर्ता से लेकर ऊपर बैठे नेताओं तक को है.
जिस तरह से पेट्रोल के दाम बढ़ रहे हैं, उससे कार्यकर्ताओं के बीच भी एक तरह का आक्रोश है.
यही वजह है कि उत्तर प्रदेश के देवरिया से सांसद कलराज मिश्र जैसे अहम व्यक्ति को यह ट्वीट करना पड़ता है कि हमें सवर्णों और अगड़ों का भी ध्यान रखना चाहिए और एकतरफ़ा नीति नहीं बनानी चाहिए.
इसलिए जितने भी मुद्दे देश में चल रहे होते हैं उनकी चर्चा पार्टी में अंदर ही अंदर ज़रूर होती है. लेकिन राष्ट्रीय कार्यकारिणी जैसे मंचों पर अब इन मुद्दों पर खुलकर चर्चा बंद हो गई है.
एक ज़माने में देश में चल रहे मुद्दों पर खुलकर चर्चाएं होती थीं, तीखी आलोचनाएं होती थीं और ये आलोचनाएं पत्रकारों तक भी पहुंच जाती थीं. लेकिन आज के समय में तो इन बैठकों में बस अच्छी-अच्छी सुनाई देने वाली बातें ही हो रही हैं.
अमित शाह का सिर्फ़ एक ही लक्ष्य बना हुआ और वो है कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखना जिससे भाजपा पिछले चुनाव में जितनी सीटें जीतकर सत्ता में आई थी, इस बार उससे ज़्यादा सीटें जीते.
डॉलर के मुकाबले रुपया लगातार गिर रहा है, इसका सबसे अधिक असर छात्रों पर पड़ेगा.
2014 से पहले नरेंद्र मोदी अपने हर भाषण में रुपये के गिरने का ज़िक्र बार-बार करते थे और इसका असर भी पड़ा.
यही वजह थी कि उस समय देश के युवाओं, छात्रों और नौकरी की तलाश कर रहे बेरो़ज़गारों ने मोदी के नाम पर भाजपा को वोट किया था.
इन सभी को कहीं न कहीं एक विश्वास हो रहा था कि अच्छे दिन शायद आने वाले हैं. और अब हाल यह है कि अब ये अच्छे दिन वाला नारा ही भाजपा को उल्टा चुभ रहा है.
उत्तर प्रदेश और दूसरी जगहों पर इस नारे का मज़ाक बनाया जा रहा है.
इसके साथ ही मोदी सरकार से किसान बहुत अधिक नाराज़ हैं. किसानों को ऐसा लग रहा है कि उन्हें उनकी फ़सल का न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं मिल रहा.
हालांकि इस मामले में हम सरकार को दोषी नहीं ठहरा सकते. सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) बढ़ाया है. बड़ा सवाल यह है कि किसानों तक यह मूल्य पहुंचता है या नहीं.
अगर आगामी प्रदेश चुनावों का ज़िक्र करें तो भाजपा के रणनीतिकार यही कहते हैं कि हमारे पास मोदी कार्ड है और अंत में वही काम करेगा.
कर्नाटक जैसे राज्य तक में मोदी के चेहरे ने काम किया, हालांकि पूरी तरह वहां पार्टी सफल नहीं हुई और उसे बहुमत नहीं मिल पाया.
मैं कर्नाटक चुनाव कवर कर रही थी तब भी लगा था कि मोदी की रैलियों ने चुनाव का माहौल भाजपा की तरफ़ करने का काम किया था.
ऐसे में इतना तो साफ़ है कि आने वाले विधानसभा चुनावों में भी भाजपा मोदी कार्ड ही खेलेगी.
तब हमें यह देखना होगा कि राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में जहां भाजपा 15 साल से सरकार में है वहां मोदी सत्ता विरोधी लहर को रोक पाते हैं या नहीं.
जैसे गुजरात विधानसभा चुनाव में मोदी भाजपा को जिताने में तो कामयाब रहे, लेकिन उतनी बड़ी जीत नहीं दिलवा सके जितनी उनसे अपेक्षा थी.
इसी तरह सुनने को मिल रहा है कि राजस्थान में सत्ता विरोधी लहर बहुत अधिक है, तो क्या मोदी फ़ैक्टर उसे दूर कर पाएगा. वो भी तब जब राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे अपने-आप में काफी बड़ी नेता हैं.
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